पश्चिमी यूपी की सियासत: इमरान-इकरा की बयानबाजी से परे सीटों का गणित
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन के बीच चल रही बयानबाजी को महज व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता मानना भ्रामक होगा। यह खींचतान आगामी विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के तहत सीटों के बंटवारे की पेचीदा गणित को उजागर करती है। इसके केंद्र में सहारनपुर से शामली-मुजफ्फरनगर तक फैला वह क्षेत्र है, जहां दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक जमीन और सामाजिक समीकरण मौजूद हैं।
क्या है इमरान मसूद और इकरा हसन के बीच असली मुद्दा?
गत लोकसभा चुनाव में इमरान मसूद ने सहारनपुर से और इकरा हसन ने कैराना से जीत दर्ज की थी। मुजफ्फरनगर से भी सपा के हरेंद्र मलिक विजयी रहे थे। हालांकि, विधानसभा का राजनीतिक भूगोल इन नतीजों से काफी अलग है। पिछले विधानसभा चुनाव में कैराना सीट सपा के पास थी, जबकि थाना भवन, शामली और बुढ़ाना राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) ने जीती थीं। सहारनपुर की कई सीटों पर सपा और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था।
इसका अर्थ यह है कि दोनों दलों के सामने असली सवाल यह नहीं है कि पश्चिमी यूपी में किसका चेहरा बड़ा है, बल्कि यह है कि गठबंधन होने पर किस दल की मौजूदा विधानसभा जमीन को कितनी सीटों में तब्दील किया जाएगा।
लोकसभा की जीत से विधानसभा की सीट तक का सफर
लोकसभा चुनाव में कैराना से इकरा हसन को पांच लाख से अधिक वोट मिले और उन्होंने भाजपा के प्रदीप कुमार को 69 हजार से अधिक मतों से हराया। वहीं, सहारनपुर में इमरान मसूद ने साढ़े पांच लाख वोट पाकर जीत दर्ज की। लेकिन इन दोनों लोकसभा सीटों के विधानसभा खंडों में तस्वीर एक जैसी नहीं रही।
कैराना लोकसभा क्षेत्र के नकुड़, गंगोह और कैराना विधानसभा खंडों में सपा आगे रही, जबकि थाना भवन में मुकाबला लगभग बराबरी का रहा और शामली में भाजपा को बढ़त मिली। यही अंतर विधानसभा चुनाव के लिए निर्णायक है। लोकसभा में गठबंधन का वोट एक उम्मीदवार के पीछे एकजुट हो जाता है, लेकिन विधानसभा में हर सीट पर अलग उम्मीदवार, अलग स्थानीय संगठन और अलग सामाजिक समीकरण सामने आते हैं। इसलिए लोकसभा के नतीजे दोनों दलों को अपनी ताकत का आधार तो देते हैं, पर सीट बंटवारे का सीधा फार्मूला नहीं।
कांग्रेस की रणनीति: सहारनपुर से आगे बढ़ने की कोशिश
इमरान मसूद की सक्रियता के बीच पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे पूर्व विधायक नवाजिश आलम का कांग्रेस में शामिल होना पश्चिमी यूपी के समीकरण में नया आयाम जोड़ता है। अमीर आलम का पुराना राजनीतिक प्रभाव शामली-मुजफ्फरनगर क्षेत्र से जुड़ा रहा है और नवाजिश आलम बुढ़ाना से विधायक रह चुके हैं।
इससे कांग्रेस के पास केवल सहारनपुर का दावा करने के बजाय शामली और मुजफ्फरनगर के इलाकों में भी राजनीतिक दावेदारी का आधार तैयार हुआ है। यह सपा के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में जिन क्षेत्रों में सपा या उसके सहयोगी मजबूत थे, वहां अब कांग्रेस के नए दावेदार सामने आ सकते हैं। गठबंधन की बातचीत में यदि कांग्रेस इन चेहरों और उनके पुराने चुनावी प्रभाव को आधार बनाती है, तो सपा के मौजूदा दावों से सीधा टकराव पैदा होगा।
इकरा हसन के सामने सिर्फ इमरान नहीं, नया कांग्रेस नेटवर्क
इकरा हसन का राजनीतिक प्रभाव कैराना पर केंद्रित है। उनका परिवार लंबे समय से इस इलाके की राजनीति में सक्रिय है और लोकसभा चुनाव में उनकी जीत ने कैराना को सपा के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बनाए रखा। हालांकि, कांग्रेस की सक्रियता सहारनपुर से शामली और मुजफ्फरनगर तक बढ़ती है, तो मुकाबला केवल इमरान और इकरा के बीच नहीं रहेगा।
कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह लोकसभा चुनाव की सफलता को विधानसभा संगठन और सीटों में कैसे बदले। सपा के सामने यह चुनौती है कि वह लोकसभा की सफलता के आधार पर गठबंधन में अधिक से अधिक सीटें अपने पास रखे। यही वजह है कि पश्चिमी यूपी में सामने आ रही बयानबाजी को सीटों के संभावित बंटवारे से जोड़कर देखा जा रहा है।
सपा के लिए पश्चिमी यूपी छोड़ना आसान नहीं
पिछले विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी के कई इलाकों में सपा और उसके सहयोगियों का प्रदर्शन मजबूत रहा। सहारनपुर की बेहट और सहारनपुर ग्रामीण जैसी सीटों पर सपा ने जीत दर्ज की, जबकि कैराना भी सपा के खाते में गई। थाना भवन, शामली और बुढ़ाना आरएलडी ने जीते।
लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन का स्वरूप बदल चुका है। अब कांग्रेस के पास सहारनपुर की लोकसभा जीत का आधार है और सपा के पास कैराना व मुजफ्फरनगर की जीत का। इसलिए सीट शेयरिंग में पश्चिमी यूपी की कुछ सीटें दोनों दलों के लिए स्वाभाविक रूप से प्राथमिकता वाली हैं। अंतिम सीट समझौता अभी नहीं हुआ है, इसलिए दोनों दलों में जोड़-आजमाइश जारी है।
कांग्रेस की मांग का आधार क्या, सपा की आपत्ति कहां
कांग्रेस की तरफ से सीटों पर जल्द फैसला करने का दबाव लगातार बनाया जा रहा है। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने हाल में कहा कि पार्टी सभी 403 सीटों पर तैयारी कर रही है और अक्टूबर तक सपा के साथ सीट बंटवारे की बातचीत पूरी करना चाहती है। दूसरी तरफ, सपा विधानसभा चुनाव के लिए अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों की तैयारी में जुटी है।
सीट बंटवारे पर अभी अंतिम फार्मूला सामने नहीं आया है। इसका सीधा असर पश्चिमी यूपी की उन सीटों पर पड़ेगा, जहां दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक आधार का दावा कर रहे हैं। गठबंधन का मूल पेंच यही है: एक दल लोकसभा के ताजा प्रदर्शन को आधार बना रहा है, तो दूसरा विधानसभा स्तर के पुराने संगठन और अपने मौजूदा राजनीतिक नेटवर्क को।
मुस्लिम वोट से आगे: जाट-गुर्जर और सहयोगी दलों का गणित
पश्चिमी यूपी की इस लड़ाई को केवल मुस्लिम मतदाताओं के नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखना अधूरा होगा। यहां मुस्लिम मतदाताओं के साथ जाट, गुर्जर, दलित, पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों का क्षेत्रवार प्रभाव है। आरएलडी का राजनीतिक आधार भी कई सीटों के समीकरण को प्रभावित करता है।
पिछले विधानसभा चुनाव में थाना भवन, शामली और बुढ़ाना जैसी सीटों पर आरएलडी की जीत और लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की सीटों पर अलग-अलग दलों को मिली जीत से स्पष्ट है कि यहां गठबंधन का गणित केवल दो दलों के वोट जोड़ने से पूरा नहीं होता। इसलिए सपा-कांग्रेस के बीच सीटों की बातचीत में अब संगठन की ग्राउंड पर मजबूती को आधार बनाने की कोशिश हो रही है।
गठबंधन की असली परीक्षा पश्चिमी यूपी में क्यों?
यदि कांग्रेस को उसके दावेदार क्षेत्रों में पर्याप्त सीटें नहीं मिलतीं, तो उसे अपने हालिया लोकसभा प्रदर्शन को विधानसभा में विस्तार देने की चुनौती होगी। यदि सपा पश्चिमी यूपी में अपनी मजबूत सीटें छोड़ती है, तो उसे अपने संगठन और मौजूदा दावेदारों को समायोजित करना होगा। दोनों स्थितियों का असर उम्मीदवार चयन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका पर पड़ेगा।
विधानसभा चुनाव का सवाल: वोट किसका, सीट किसकी?
पश्चिमी यूपी में सपा-कांग्रेस के बीच मौजूदा खींचतान का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने साथ मिलकर लड़ा और पश्चिमी यूपी में कई सीटों पर विपक्षी गठबंधन को सफलता मिली। अब आगामी विधानसभा चुनाव में हर सीट पर उम्मीदवार अलग होगा। इसलिए यह तय करना चुनौती है कि किस क्षेत्र में किस दल का उम्मीदवार गठबंधन के साझा वोट को बेहतर तरीके से समेट सकता है।
इमरान मसूद और इकरा हसन के बीच बयानबाजी से ज्यादा महत्वपूर्ण अब वह राजनीतिक तैयारी है, जो दोनों दल अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में कर रहे हैं। अमीर आलम और नवाजिश आलम का कांग्रेस में आना इसी कड़ी का असर है। इसके बाद पश्चिमी यूपी में कांग्रेस की दावेदारी सहारनपुर से आगे बढ़कर शामली-मुजफ्फरनगर की उन सीटों तक पहुंच गई है, जहां सपा और उसके सहयोगियों का पहले से राजनीतिक आधार है।
विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में सवाल अब इमरान बनाम इकरा का नहीं है। सवाल यह है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन हुआ तो पश्चिमी यूपी का राजनीतिक नक्शा दोनों दलों के बीच किस तरह बांटा जाएगा। यही सीटों का भूगोल आगे गठबंधन की जमीन भी तय करेगा।
इकरा बनाम इमरान: किसने क्या कहा?
इमरान मसूद
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सपा नेतृत्व की भूमिका और गठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सीटों का बंटवारा समय रहते और सम्मानजनक हिस्सेदारी के साथ होना चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि कांग्रेस को पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक ताकत के अनुरूप जगह मिलनी चाहिए।
इकरा हसन
सपा सांसद इकरा हसन ने इमरान मसूद के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव को विपक्ष का प्रमुख चेहरा बताया। उन्होंने कांग्रेस नेताओं को गठबंधन में रहते हुए बयानबाजी में संयम बरतने का संदेश दिया और कहा कि भाजपा के खिलाफ मुकाबले में विपक्षी एकता जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पश्चिमी यूपी में सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर विवाद क्यों है?
पश्चिमी यूपी में दोनों दलों के पास अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूत राजनीतिक आधार है। कांग्रेस सहारनपुर लोकसभा सीट पर अपनी जीत और अमीर आलम जैसे नेताओं के शामिल होने के बाद शामली-मुजफ्फरनगर में दावा कर रही है, जबकि सपा कैराना और मुजफ्फरनगर में अपनी पकड़ छोड़ने को तैयार नहीं है।
इमरान मसूद और इकरा हसन के बीच बयानबाजी का क्या मतलब है?
यह बयानबाजी व्यक्तिगत नहीं, बल्कि गठबंधन में सीटों की हिस्सेदारी को लेकर है। दोनों नेता अपने-अपने दल की राजनीतिक ताकत को सीटों में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या लोकसभा चुनाव के नतीजे विधानसभा चुनाव में भी दोहराए जाएंगे?
जरूरी नहीं। लोकसभा में गठबंधन का वोट एक उम्मीदवार के पीछे जाता है, लेकिन विधानसभा में हर सीट पर अलग उम्मीदवार और अलग सामाजिक समीकरण होते हैं। इसलिए लोकसभा के नतीजे सीट बंटवारे का सीधा फार्मूला नहीं हैं।
पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटों के अलावा कौन से समीकरण मायने रखते हैं?
पश्चिमी यूपी में जाट, गुर्जर, दलित, पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों का क्षेत्रवार प्रभाव है। आरएलडी का राजनीतिक आधार भी कई सीटों के समीकरण को प्रभावित करता है।